पिछले तीस दिनों के पन्नों को पलटिए, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो देश का हर कोना किसी खौफनाक साए की गिरफ्त में आ चुका है। सियासी मंचों से लेकर विज्ञापनों के चमकते फलकों तक महिला सुरक्षा के जितने बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, पिछले एक महीने के भीतर देश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आई वीभत्स घटनाओं ने उन तमाम दावों की चूलें हिलाकर रख दी हैं। ग्रेटर नोएडा से दिल्ली के बीच चलती स्लीपर बस में एक नाबालिग के साथ हुआ जघन्य कथित गैंगरेप सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि इस पूरी व्यवस्था के माथे पर ऐसा बदनुमा दाग है जो कभी धुंधला नहीं हो सकता। जब राजधानी और उसके आसपास के हाई-प्रोफाइल इलाकों में दरिंदे कानून को सरेआम ठेंगा दिखाने लगें, तो आम रास्तों, सूदूर गांवों और छोटे कस्बों की सुरक्षा का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। यह दौर महज वारदातों का नहीं, बल्कि उस सामाजिक और प्रशासनिक पराभव का है जहां न्याय की उम्मीदें दम तोड़ती नजर आ रही हैं।
47 किलोमीटर का नरक: चलती बस और सिसकता भरोसा
बीती 4 अगस्त की वह काली रात उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के सुरक्षा तंत्र की पोल खोलने के लिए पूरी तरह काफी थी। ग्रेटर नोएडा के परी चौक से शुरू हुआ वह सफर किसी मंजिल तक पहुंचने का नहीं, बल्कि 47 किलोमीटर लंबे उस नंगे नाच का गवाह बना जहां एक 16 साल की नाबालिग छात्रा की अस्मिता को बेरहमी से कुचल दिया गया। मूसलाधार बारिश, चारों तरफ घना अंधेरा और जीवन की सामान्य भागदौड़ के बीच मदद की आस में उस बस में चढ़ने वाली मासूम को क्या पता था कि वह कोई यात्री वाहन नहीं, बल्कि चलता-फिरता कसाईखाना है।
बस की खिड़कियों पर पर्दे गिरे हुए थे, ड्राइवर कुलदीप और कंडक्टर संदीप अपनी हवस की आग में इंसानियत की सारी सीमाएं लांघ चुके थे, और वह वाहन बेरोक-टोक एक्सप्रेसवे और दिल्ली की सीमाओं को पार करता रहा। सवाल यह नहीं है कि उन दरिंदों ने यह घिनौना कृत्य कैसे किया; असली और बड़ा सवाल यह है कि एक व्यावसायिक वाहन 47 किलोमीटर तक बिना किसी पुलिस चेकिंग, बिना किसी फास्टैग या सीसीटीवी की पकड़ के, और बिना किसी रोक-टोक के फर्राटे कैसे भरता रहा? क्या परिवहन विभाग के अधिकारी सिर्फ दफ्तरों में बैठकर फाइलों पर धूल फांकने और सरकारी आंकड़ों को सुंदर दिखाने के लिए तनख्वाह ले रहे हैं? क्या सड़कों पर दौड़ने वाली हर बस सिर्फ कागजों पर सुरक्षित है और जमीन पर मौत का सामान परोस रही है?
एक महीने का काला चिट्ठा: क्या ‘बेटी बचाओ’ सिर्फ एक मुखौटा है?
यदि पिछले तीस दिनों के राष्ट्रीय आंकड़ों और मीडिया रिपोर्ट्स के पन्नों को गौर से देखा जाए, तो हर सुबह अखबारों के पन्ने किसी न किसी बेटी की चीख, उसके अपमान और न्याय के लिए उसकी लाचार गुहार से रंगे मिलते हैं। देश के अलग-अलग राज्यों से लगातार सामने आ रहे बलात्कार, सामूहिक दुष्कर्म, उत्पीड़न और हिंसा के मामलों ने यह साबित कर दिया है कि “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” के नारे अब केवल सरकारी दीवारों पर लिखे बदरंग पोस्टर या चुनावी रैलियों के जुमले बनकर रह गए हैं।
जब सार्वजनिक परिवहन, बसें, मेट्रो स्टेशन और रात की खुली सड़कें महिलाओं के लिए असुरक्षित हो जाएं, तो आम नागरिकों का इस व्यवस्था पर से भरोसा उठना पूरी तरह स्वाभाविक है। हर बार ऐसी किसी घटना के बाद एक तयशुदा और शर्मनाक चक्र चलता है—घटना घटती है, समाज में उबाल आता है, तीखी प्रतिक्रियाएं और मोमबत्ती मार्च निकलते हैं, राजनेता सोशल मीडिया पर रस्मी ट्वीट कर अपनी औपचारिकता निभाते हैं, और कुछ दिनों बाद पूरा देश किसी अगली दर्दनाक घटना के इंतजार में फिर से शांत बैठ जाता है। आखिर कब तक देश की बेटियां इन खोखले आश्वासनों, राजनीतिक बयानबाजी और कागजी वादों की भेंट चढ़ती रहेंगी? क्या महिलाओं की सुरक्षा केवल चुनावों के वक्त घोषणापत्रों का एक पन्ना बनकर रह गई है?
थानों की सरहदें और पुलिसिया लापरवाही: न्याय से पहले कागजों का खेल
ग्रेटर नोएडा वाली इस खौफनाक घटना के बाद जब परतें खुलीं, तो एक और चौंकाने वाला सच सामने आया—उस बस के कर्मचारियों का न तो कोई पुलिस सत्यापन (Police Verification) हुआ था और न ही वाहन में सुरक्षा के बुनियादी मानक पूरे थे। बिना वेरिफिकेशन के अपराधी प्रवृत्ति के लोग व्यावसायिक वाहनों पर ड्राइवर और कंडक्टर बनकर खुलेआम घूम रहे हैं। लेकिन इस सबके बाद जो सबसे शर्मनाक तमाशा देखने को मिला, वह था उत्तर प्रदेश पुलिस और दिल्ली पुलिस के बीच का 'क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र' (Jurisdiction) विवाद। एक तरफ जहां दिल्ली पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए आरोपियों को दबोचा, तो दूसरी तरफ यूपी पुलिस यह दलील देती नजर आई कि उन्हें समय पर सूचना नहीं मिली थी या मामला उनके इलाके का नहीं था।
अरे, शर्म आनी चाहिए उस खाकी और उस कुर्सी को जो एक पीड़िता को न्याय दिलाने से पहले अपनी फाइलें, थाने की सीमाएं और अधिकार क्षेत्र टटोलने लगती है! क्या अपराधियों को पकड़ते वक्त पुलिस को सीमाएं याद नहीं आतीं, जितनी फुर्ती कागजी खानापूर्ति में दिखाई जाती है? क्या बस मालिकों और ट्रांसपोर्ट कंपनियों पर लगाम कसने के लिए कोई ठोस और कठोर कानून नहीं है? जिन प्रशासनिक अधिकारियों की नाक के नीचे बिना पुलिस वेरिफिकेशन के अनगिनत गाड़ियां सड़कों पर मौत का तांडव मचा रही हैं, उन पर अब तक बर्खास्तगी की गाज क्यों नहीं गिरी? जब तक अपराधियों के साथ-साथ इन लापरवाह और भ्रष्ट अफसरों की गर्दन नहीं नापी जाएगी, तब तक यह खूनी खेल यूं ही बदस्तूर जारी रहेगा।
नसीहतें बेटियों को नहीं, व्यवस्था को चाहिए सुधार का कड़ा डोज
हर बार जब भी कोई जघन्य अपराध सामने आता है, तो समाज का एक तबका और तथाकथित ठेकेदार सबसे पहले देश की बेटियों को ही नसीहतें देने बैठ जाते हैं—रात में बाहर मत निकलो, अकेले सफर मत करो, कपड़े ठीक पहनो, अनजान लोगों पर भरोसा मत करो, संभाल कर रहो। लेकिन यह विकृत और घटिया मानसिकता ही इस समाज के माथे पर सबसे बड़ा धब्बा है। जिम्मेदारी महिलाओं को पिंजरे में कैद करने या उन्हें नियंत्रित करने की नहीं, बल्कि उन भेड़ियों को समाज से नेस्तनाबूद करने की है जो खुलेआम कानून की धज्जियां उड़ाते घूम रहे हैं।
सत्ता किसी भी दल की हो, हुक्मरान चाहे कोई भी हों—महिलाओं की सुरक्षा का ढिंढोरा पीटने वालों को आज आईना देखना होगा। ग्रेटर नोएडा से लेकर देश के हर कोने तक गूंज रही इन चीखों ने यह साफ कर दिया है कि कागजी वादों और खोखले नारों से अब काम नहीं चलने वाला। जनता को लंबे-चौड़े भाषण नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई और ऐसा खौफनाक न्याय चाहिए जो भविष्य में किसी भी दरिंदे की रूह कंपा दे। यदि अब भी इस गूंगी-बहरी और सुस्त व्यवस्था की आंखें नहीं खुलीं, तो इतिहास इस दौर को सबसे शर्मनाक और काले कालखंड के रूप में याद रखेगा। वक्त आ गया है कि नारे बंद हों, और जमीन पर एक ऐसी अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था खड़ी हो, जहां हर बेटी बिना किसी डर के, स्वतंत्र रूप से सांस ले सके।
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